
जोजिला सुरंग के शुरू होने से जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से लेह-लद्दाख को जोड़ने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग-एक बर्फबारी से मुक्त हो जाएगी.
जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को जोड़ने वाली जोजिला टनल (सुरंग) इन दिनों सुर्खियां बटोर रही है. देश में इसकी खूब चर्चा हो रही है. इस टनल का लगभग 70 फीसदी काम पूरा हो गया है. उम्मीद की जा रही है कि सुरंग का काम साल 2027 तक पूरा हो जाएगा. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने लोकसभा में बताया कि शुरुआत में इसकी लागत 12 हजार करोड़ तय की गई थी, लेकिन इसे मात्र 5500 करोड़ में पूरा कर लिया जाएगा.
भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता वाले इस प्रोजेक्ट के समय से पूरा न होने में सबसे बड़ी बाधा मौसम बना. जहां यह सुरंग बन रही है, उसके अधिकतर हिस्से में लगभग वर्षभर बर्फ पड़ती है. यह प्रोजेक्ट साल 2025 में पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया था.
सबसे लंबी और ऊंचाई पर बनी सुरंग
यह टनल देश ही नहीं एशिया की सबसे लंबी सुरंग होने का दावा है. लंबाई 14 किलो मीटर से कुछ ज्यादा है. यह समुद्र तल से करीब 12 हजार फुट (सरकारी दस्तावेजों में 11578 फुट दर्ज है) की ऊंचाई पर बन रही है. अब तक देश में कोई भी सुरंग इतनी ऊंचाई पर नहीं बनी है. इसके निर्माण में आने वाली किसी भी बाधा को सरकार तुरंत खत्म कर रही है, क्योंकि यह सुरंग चालू हो जाने के बाद अनेक प्रतिमान स्थापित करेगी.
देश के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सुरंग?
जोजिला दर्रा सर्दियों में बंद हो जाता है. इसके बंद होने के साथ ही जम्मू-कश्मीर का लेह-लद्दाख से संपर्क टूट जाता है. इसके शुरू होने के साथ ही दोनों महत्वपूर्ण स्थानों के बीच पूरे साल यातायात सुचारु रहेगा. सामरिक दृष्टि से यह सुरंग बहुत महत्वपूर्ण भूमिका में रहने वाली है. अभी लेह-लद्दाख के इलाके में पाकिस्तान-चीन सीमा पर तैनात सेना के बहादुर जवानों को रसद-हथियार से लेकर अन्य सभी जरूरी चीजों की आपूर्ति का एकमात्र जरिया हेलीकाप्टर या कहीं कहीं छोटे-छोटे विमान हैं.
इस सुरंग के शुरू होने के बाद जम्मू-कश्मीर से सामान सीधे लेह-लद्दाख तक सड़क मार्ग से पूरे साल पहुंचाना आसान हो जाएगा. इससे सेना की लागत कम होगी और कम समय में वहां तैनात हेलीकाप्टर जरूरी सामान की आपूर्ति कर सकेंगे.
यात्रा का समय हो जाएगा कम
इस सुरंग के शुरू होने से जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर से लेह-लद्दाख को जोड़ने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग-एक बर्फबारी से मुक्त हो जाएगी. इससे यात्रा का समय लगभग 3.30 घंटे कम हो जाएगा. ऐसे में इस पूरे हिमालयी क्षेत्र के लोगों का जीवन आसान होगा. पर्यटन बढ़ेगा. रोजगार के साधन बढ़ेंगे. आर्थिक विकास भी स्वाभाविक रूप से होगा. यह एक सुरंग न केवल देश के लोगों की जम्मू-कश्मीर से लेकर लेह-लद्दाख तक पहुंच आसान करेगी बल्कि दोनों ही केंद्र शासित प्रदेशों में रहने वाली बड़ी आबादी को भी देश से नए तरीके से कनेक्ट करेगी.
अभी तक यहां के लोग साल के लगभग छह महीने तक अपने इलाके में लगभग कैद से हो जाते हैं. बर्फबारी की वजह से वे यात्रा के बारे में सोचना भी बंद कर देते हैं. उन सभी लोगों का जीवन आसान हो सकेगा.
कितनी रफ्तार से फर्राटा भर सकेंगे?
इसे स्मार्ट टनल के रूप में विकसित किया जा रहा है. इसमें चलने वाले वाहनों की औसत रफ्तार 80 किमी प्रति घंटा हो सकती है. इसकी चौड़ाई 89 मीटर है. सुरंग मौजूद सड़क से चार सौ मीटर नीचे बनी है. इससे यात्रा करने वाले पर्यटक टनल में रुककर बाहर का खूबसूरत नजारा देख सकेंगे. इसके 450 मीटर के एक हिस्से में 70 विंडो बनाई जा रही है, जो घाटी के मनोरम दृश्य और बर्फबारी को देखने में मददगार होंगे. इसमें निर्बाध बिजली आपूर्ति रहेगी, सीसीटीवी से निगरानी की व्यवस्था की जा रही है. सुरक्षा के लिए सेना और केन्द्रीय बलों के जवान तो अनिवार्य रूप से रहेंगे. सुरंग रेडियो प्रणाली से लेकर आपातकालीन प्रकाश व्यवस्था भी की जा रही है.
बालटाल से मिनीमर्ग तक विस्तार
सुरंग जम्मू-कश्मीर के गंदेरबल जिले में स्थित बालटाल से लद्दाख के कारगिल जिले के द्रास के मिनीमर्ग तक इसका विस्तार होना प्रस्तावित है. प्रोजेक्ट में 18 किलो मीटर की एप्रोच रोड शामिल की गई है. सोनमर्ग (जम्मू-कश्मीर) से मिनीमर्ग (लद्दाख) की दूरी लगभग 31 किलो मीटर है लेकिन स्थानीय निवासियों और सुरक्षा बलों को यह दूरी तय करने में काफी समय लगता है, जबकि देश के मैदानी इलाकों में 31 किलो मीटर की दूरी आधा घंटा में भी लोग तय कर लेते हैं.
जानना यह भी जरूरी है कि बालटाल अमरनाथ यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है. ऐसे में सुरंग अमरनाथ यात्रा को भी सुगम बनाने में किसी न किसी रूप में मददगार होगी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2018 में इस महत्वपूर्ण परियोजना का शिलान्यास किया था.
मोदी सरकार के कार्यकाल में तैयार कुछ अन्य सुरंगों के बारे में भी जान लेते हैं. सबका अपना इतिहास है और सबका अपना रिकार्ड. हर सुरंग की खासियत अलग-अलग है, इसलिए कोई न कोई रिकार्ड भी सबके नाम दर्ज है.
मोदी सरकार में कितनी सुरंग बनीं?
- Z MORH सुरंग: पीएम नरेंद्र मोदी ने इसी साल जनवरी में जम्मू-कश्मीर में Z MORH सुरंग परियोजना का शुभारंभ किया है. कह सकते हैं कि यह सुरंग जोजिला सुरंग की पूरक है. 12 किलो मीटर लंबी इस सुरंग में एप्रोच रोड भी शामिल है. यह समुद्र तल से 8650 फुट की ऊंचाई पर बना है. इसके शुरू होने से सोनमर्ग तक पूरे साल पहुंच आसान हो गई है. इसके निर्माण पर 2700 करोड़ रुपए की लागत आई है. घाटी के लोगों का जीवन इस सुरंग ने भी आसान किया है. सुरक्षा बलों के लिए भी यह वरदान जैसी है.
- अटल टनल: हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में मनाली से लेह को जोड़ने वाले अटल टनल का शुभारंभ साल 2020 के अक्तूबर महीने में हुआ था. पीएम नरेंद्र मोदी ने इसे देश को सौंपा था. साल 2022 में इसे सबसे लंबी हाइवे सुरंग का दर्ज मिला था. इसकी लंबाई नौ किलो मीटर है और यह समुद्र तल से 10 हजार फुट की ऊंचाई पर बनी है. आज यह प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में पहचान बना चुकी है. पर, जोजिला सुरंग के शुरू होने के साथ ही अटल टनल के सारे रिकार्ड फीके पद जाएंगे क्योंकि इसके नाम कई नए रिकार्ड बनने वाले हैं.
- सेला टनल: यह दुनिया की सबसे लंबी बाईलेन सुरंग है. इसका निर्माण अरुणाचल प्रदेश में किया गया है. 9 मार्च साल 2024 को यह देश को सुपुर्द किया गया. यह तवांग जिले को बाकी अरुणाचल प्रदेश से जोड़ती है. सामरिक दृष्टि से इसका अत्यधिक महत्व है. इसकी लंबाई 12 किलो मीटर से ज्यादा है.
- पटनी टॉप सुरंग: जम्मू-कश्मीर के रामबन जिले में स्थित इस टनल की शुरुआत साल 2017 में हुई. इसे डॉ श्याम प्रसाद मुखर्जी सुरंग के नाम से भी जाना जाता है. इसकी लंबाई 9.28 किलो मीटर तथा यह समुद्र तल से लगभग चार हजार फुट की ऊंचाई पर बना हुआ है. इसकी चौड़ाई लगभग 43 फुट है. यह एनएच 44 पर बना है.
- बनिहाल-काजीगुंड सुरंग: जम्मू-कश्मीर में बने इस सुरंग की शुरुआत साल 2021 में हुई. इसकी लंबाई 8.45 किलोमीटर है. चार लें में बने इस सुरंग में स्पीड लिमिट 70 किलोमीटर प्रति घंटा तय है. यह जम्मू संभाग को कश्मीर से जोड़ने में मददगार है.
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