सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें केंद्र को स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) से पीड़ित एक मरीज को 50 लाख रुपये की सीमा से परे 18 लाख रुपये की अतिरिक्त दवाएं उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था.
स्पाइनल मस्कुलर अट्रोफी बच्चों में पाई जाने वाली एक दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी है जो मांसपेशियों के काम करने के तरीके को कंट्रोल करने वाली तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है.
कोर्ट ने क्या-क्या कहा?
सीजेआई संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की बेंच ने 24 फरवरी को केंद्र की याचिका पर प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया. बेंच ने कहा कि 17 अप्रैल तक नोटिस का जवाब दिया जाए. बेंच ने कहा, जिस फैसले को चुनौती दी गई है उसके तहत दिए आदेश पर अगली सुनवाई की तारीख तक रोक रहेगी. इस नीति के तहत केंद्र सरकार जरूरतमंद मरीज को इलाज के लिए 50 लाख रुपये तक दे सकती है.
सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी को निर्देश दिया था कि जब तक एसएमए की दवा की उच्च कीमत का मामला एकल न्यायाधीश की बेंच हल नहीं कर लेती, तब तक एक बार के उपाय के तौर पर 24 वर्षीय सेबा पीए को दवा रिसडिप्लाम दी जानी चाहिए ताकि उसका निरंतर इलाज सुनिश्चित किया जा सके. एकल बेंच के फैसला करने की प्रक्रिया में कम से कम एक महीने का समय लगने की संभावना है.
बीमारी कितनी गंभीर?
सुप्रीम कोर्ट के सामने दायर सेबा की याचिका में रिसडिप्लाम की अत्यधिक लागत पर रोशनी डाली गई है. इस दवा की कीमत 6.2 लाख रुपये प्रति बोतल है.
इस बीमारी से पीड़ित 20 किलोग्राम तक वजन वाले मरीजों को महीने में एक बोतल की जरूरत होती है, जबकि अधिक वजन वाले मरीजों को तीन बोतलों तक की जरूरत पड़ सकती है, जिससे इलाज में पैसों की सख्त जरूरत पेश आती है.
केंद्र ने क्या तर्क दिया?
केंद्र ने तर्क दिया कि हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि उसका यह फैसला और मामलों के लिए बाध्यकारी मिसाल नहीं है, लेकिन किसी एक व्यक्ति को छूट देने से एक उदाहरण पेश होता है.
इसमें कहा गया है, भारत में 3,000 से अधिक मरीज हैं, जिनकी परिस्थितियां अलग-अलग हैं और अगर प्रत्येक मामले पर अलग-अलग गौर किया जाए तो इससे ऐसा वित्तीय बोझ पैदा हो सकता है जिसे वहन करना संभव नहीं होगा.
केंद्र के वकील ने कहा कि सरकार की नीति में सभी मरीजों के लिए 50 लाख रुपये की सीमा तय की गई है, चाहे उपलब्ध संसाधन कुछ भी हों. सेबा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने कहा कि सरकार या तो दवा निर्माता के साथ बातचीत करके या पेटेंट अधिनियम, 1970 के प्रावधानों को लागू करके एसएमए के इलाज की लागत को कम करने के लिए कदम उठा सकती थी.
ग्रोवर ने कहा कि चीन और पाकिस्तान जैसे देशों ने दवा निर्माता के साथ बातचीत कर एसएमए इलाज की कीमत कम करने में सफलता हासिल की है. उन्होंने सवाल किया कि भारत ने इसी तरह के कदम क्यों नहीं उठाए.
बेंच ने कहा कि भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय प्रभावों के चलते ऐसे कदम उठाने से बच रही है. बेंच ने कहा, भारत सरकार इसमें दिलचस्पी क्यों नहीं लेगी? वे इसमें बहुत दिलचस्पी लेंगे. इस पर आलोचना करना आसान है. उन्होंने कीमतें कम करने के लिए अपनी तरफ से पूरी कोशिश की होगी. बेंच ने केंद्र से कहा कि वह मामला-दर-मामला आधार पर 50 लाख रुपये से अधिक के व्यय को मंजूरी देने की संभावना तलाशे.
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