
अश्विनी चौबे ने पार्टी को अकेले चुनाव लड़ने की सलाह दी है.
पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने गुरुवार को बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर बड़ा दावा किया. चौबे ने कहा कि बिहार में अगर बीजेपी अकेले भी चुनाव लड़ेगी, तब आसानी से जीत जाएगी. चौबे का यह दावा ऐसे वक्त में आया है, जब बिहार में समय से पहले चुनाव कराए जाने की सुगबुगाहट है.
भागलपुर में एक कार्यक्रम के बाद अश्विनी चौबे ने कहा- मेरी दो इच्छा है. पहली इच्छा यह है कि चुनाव से पहले एनडीए में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न किया जाए. दूसरी इच्छा बीजेपी के बड़ी पार्टी बनकर चुनाव लड़ने और लड़ाने की है. पहले बीजेपी अपने दम पर सरकार बनाए और फिर सहयोगियों को साथ लेकर चलें.
चौबे के इस बयान पर जेडीयू ने भी पलटवार किया है. जेडीयू महासचिव संजय झा के मुताबिक बिहार में एनडीए का मतलब नीतीश कुमार ही है. चौबे के वार और जेडीयू के पलटवार के बीच बिहार के सियासी गलियारों में यह सवाल उठ रहा है कि क्या सच में बीजेपी जेडीयू से अलग होकर चुनाव लड़ सकती है?
अश्विनी चौबे कौन हैं और उनकी राजनीतिक हैसियत
मूल रूप से भागलपुर के रहने वाले अश्विनी चौबे पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं. 1995 में वे पहली बार भागलपुर से विधायक बने. 2005 में जब बीजेपी और जेडीयू की सरकार बनी तो चौबे को नीतीश कैबिनेट में शहरी विकास विभाग का मंत्री बनाया गया. 2008 तक वे इस पद पर रहे.
2008-2010 तक वे पीएचईडी विभाग के मंत्री रहे. 2010 में उन्हें स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी मिली, जिस पर वे 2013 तक रहे. 2014 के लोकसभा चुनाव में अश्विनी चौबे को पार्टी ने बक्सर लोकसभा से उम्मीदवार बनाया.
चौबे ने इस चुनाव में आरजेडी के कद्दावर नेता जगदानंद सिंह को 1 लाख 32 हजार वोटों से हराया. 2017 में मोदी कैबिनेट के विस्तार में उन्हें स्वास्थ्य विभाग का राज्यमंत्री बनाया गया. 2019 में वे फिर से बक्सर सीट से जीते और मोदी कैबिनेट में शामिल हुए.
फायरब्रांड नेता के तौर पर पहचान बनाने वाले अश्विनी चौबे को 2024 के चुनाव में टिकट नहीं मिला. शुरू में उन्होंने प्रदेश इकाई के खिलाफ बगावत का रूख भी अख्तियार किया था, लेकिन बाद में हाईकमान के दखलअंदाजी के बाद वे शांत हो गए.
नीतीश कुमार को इग्नोर कर पाएगी बीजेपी?
अश्विनी चौबे के बयान के बाद बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में बीजेपी नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू को इग्नोर कर पाएगी? इस स्टोरी में इन्हीं सवालों का विस्तार से जवाब जानते हैं…
1. 20 साल से नीतीश सेंटर, अलग लड़े तो चौबे भी हारे
पिछले 20 साल से नीतीश कुमार बिहार के सेंटर बने हुए हैं. 2005 के अक्टूबर में जब बिहार विधानसभा के चुनाव हुए तो इस चुनाव में जेडीयू और बीजेपी मिलकर लड़ी. चुनाव के जब नतीजे आए तो जेडीयू को 88 और बीजेपी को 55 सीटों पर जीत मिली. इस चुनाव में जेडीयू का वोट प्रतिशत 20.46 था.
2010 के चुनाव में भी दोनों दल साथ उतरी. चेहरा नीतीश कुमार ही था, जिसका रिजल्ट भी देखने को मिला. इस चुनाव में जेडीयू को 115 तो बीजेपी को 91 सीटों पर जीत मिली. जेडीयू के वोट प्रतिशत में 2 प्रतिशत का इजाफा हुआ. वहीं बीजेपी के वोट प्रतिशत में मामूली बढ़त देखने को मिली.
साल 2015 में जेडीयू आरजेडी के साथ मैदान में उतरी. बीजेपी ने लोजपा और रालोसपा के साथ गठबंधन तैयार किया, लेकिन जब चुनाव के नतीजे आए तो यह बीजेपी के लिए झटका ही साबित हुआ.
इस चुनाव में जेडीयू को 71, आरजेडी को 80 और कांग्रेस को 27 सीटों पर जीत मिली. बीजेपी बुरी तरह पिटी और उसे सिर्फ 53 सीटें मिल पाईं. अश्विनी चौबे के गढ़ भागलपुर की सभी 7 सीटें बीजेपी हार गई. खुद चौबे के बेटे अजित सत्यार्थी भागलपुर सदर सीट से 10 हजार वोट से चुनाव हार गए.
इतना ही नहीं, चौबे जिस संसदीय सीट बक्सर से सांसद थे. वहां भी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा. 2020 में जेडीयू और बीजेपी फिर से मिलकर चुनाव मैदान में उतरी. हालांकि, इस चुनाव में बीजेपी जेडीयू पर भारी पड़ गई.
जेडीयू के वोट प्रतिशत और सीट दोनों में गिरावट देखने को मिली. 2020 में जेडीयू को 41 और बीजेपी को 73 सीटों पर जीत मिली. हालांकि, जेडीयू के वोट प्रतिशत जस का तस बना रहा. उलट बीजेपी के वोट प्रतिशत में ही गिरावट आ गई. 2020 में बीजेपी का वोट प्रतिशत 19.46 प्रतिशत था.
2. केंद्र की सरकार में जेडीयू तीसरी बड़ी पार्टी
2024 के चुनाव में बीजेपी को अकेले दम पर लोकसभा में बहुमत नहीं मिल पाया है. एनडीए दलों के समर्थन के आधार पर ही तीसरी बार मोदी सरकार का गठन हुआ है. सरकार में जेडीयू तीसरी बड़ी पार्टी है.
उसके पास लोकसभा में 12 और राज्यसभा में 5 सांसद हैं. केंद्रीय कैबिनेट में जेडीयू के कोटे से 2 मंत्री बनाए गए हैं. केंद्र में सरकार गठन के तुरंत बाद बीजेपी विधायक दल के नेता सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का ऐलान किया था.
ऐसे में इस बात की संभावना कम दिख रही है कि बीजेपी जेडीयू को सीधे तौर पर फिलहाल इग्नोर कर पाए.
चौबे फिर इस तरह का बयान क्यों दे रहे हैं?
लोकसभा से टिकट कटने के बाद से ही अश्विनी चौबे नाराज चल रहे हैं. बीजेपी सूत्रों के मुताबिक चौबे को लगता है कि उनका टिकट प्रदेश लीडरशिप के कहने पर ही काटा गया. इसलिए शुरुआत में वे काफी मुखर भी थे. हालांकि, हाईकमान के कहने पर वे कुछ दिनों के लिए शांत हो गए थे.
वर्तमान में सम्राट चौधरी बिहार के प्रदेश अध्यक्ष और विधानमंडल दल के नेता हैं. चौबे ने नीतीश के साथ ही उन्हें भी लपेटा है. जानकारों का कहना है कि चौबे जब तक राजनीति रूप से कही स्थापित नहीं हो जाते हैं, तब तक वे इस तरह के बयान देते रह सकते हैं.
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